Friday, 5 April 2024

Divya Drishti: कलि युग - कलयुग है चारम पर

 विश्व की आयु के सम्बन्ध में हिन्दू सिद्धान्त तीन प्रकार के समयविभाग उपस्थित करता है। वे हैं-युग, मन्वन्तर एवं कल्प। युग चार हैं-कृत, त्रेता, द्वापर एवं कलि। ये प्राचीनोक्त स्वर्ण, रूपा, पीतल एवं लौह युग के समानार्थक हैं। उपर्युक्त नाम जुए के पासे के पक्षों के आधार पर रखे गए हैं। कृत सबसे भाग्यवान् माना जाता है, जिसके पक्षों पर चार बिन्दु हैं, त्रेता पर तीन, द्वापर पर दो एक कलि पर मात्र एक बिन्दु है। ये ही सब सिद्धान्त युगों के गुण एवं आयु पर भी घटते हैं।

युग आयु

युगों में मनुष्य के अच्छे गुणों का ह्रास होता है तथा युगों की आयु भी क्रमश: 4800 वर्ष, 3600 वर्ष, 2400 वर्ष व 1200 वर्ष है। सभी के योग को 'महायुग' कहते हैं, जो 12000 वर्ष का है। किन्तु ये वर्ष दैवी हैं और एक दैवी वर्ष 360 मानवीय वर्ष के तुल्य होता है, अतएव एक महायुग 43,20,000 वर्ष का होता है। कलि का मानवीय युगमान 4,32,000 वर्ष है।


मान्यताएँ

1.आर्यभट के अनुसार महाभारत का युद्ध 3109 ई. पू. में हुआ था और उसके अंत के साथ ही कलियुग का आरंभ हो गया।

2.कुछ विद्वान् कलियुग का आरंभ महाभारत युद्व के 625 वर्ष पहले से मानते हैं। फिर भी सामान्यत: यही विश्वास किया जाता है कि महाभारत युद्ध के अंत, श्री कृष्ण के स्वर्गारोहण और पांडवों के हिमालय में गलने के लिए जाने के साथ ही कलि युग का आरंभ हो गया।

3.इस युग के प्रथम राजा परीक्षित हुए।

4.आर्यभट के अनुसार महाभारत का युद्ध 3109 ई. पू. में हुआ था और उसके अंत के साथ ही कलि युग का आरंभ हो गया।


कलियुग का प्रभाव

कलि (तिष्य) युग में कृत (सत्ययुग) के ठीक विपरीत गुण आ जाते हैं। वर्ण एवं आश्रम का सांकर्य, वेद एवं अच्छे चरित्र का ह्रास, सर्वप्रकार के पापों का उदय, मनुष्यों में नानाव्याधियों की व्याप्ति, आयुका क्रमश: क्षीण एवं अनिश्चित होना, बर्बरों द्वारा पृथ्वी पर अधिकार, मनुष्यों एवं जातियों का एक-दूसरे से संघर्ष आदि इसके गुण हैं। इस युग में धर्म एकपाद, अधर्म चतुष्पाद होता है, आयु सौ वर्ष की। युग के अन्त में पापियों के नाश के लिए भगवान कल्कि-अवतार धारण करेंगे।


युगों की इस कालिक कल्पना के साथ एक नैतिक कल्पना भी है, जो ऐतरेय ब्राह्मण तथा महाभारत में पायी जाती है-


कलि: शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापर:।

उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृत: सम्पद्यते चरन्।।


(सोने वाले के लिए कलि, अंगड़ाई लेने वाले के लिए द्वापर, उठने वाले के लिए त्रेता और चलने वाले के लिए कृत (सत्ययुग) होता है।)


कलियुग की उत्पत्ति

कल्किपुराण (प्रथम अध्याय) में कलियुग की उत्पत्ति का वर्णन निम्नांकित है-


संसार के बनाने वाले लोकपितामह ब्रह्मा ने प्रलय के अन्त में घोर मलिन पापयुक्त एक व्यक्ति को अपने पृष्ठ भाग से प्रकट किया। वह अधर्म नाम से प्रसिद्ध हुआ, उसके वंशानुकीर्तन, श्रवण और स्मरण से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। अधर्म की सुन्दर विडालाक्षी (बिल्ली के जैसी आँखवाली) भार्या मिथ्या नाम की थी। उसका परमकोपन पुत्र दम्भ नामक हुआ। उसने अपनी बहिन माया से लोभ नामक पुत्र और निकृति नामक पुत्री को उत्पन्न किया। उन दोनों से क्रोध नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने अपनी हिंसा नामक बहिन से कलि महाराज को उत्पन्न किया। वह दाहिने हाथ से जिह्वा और वाम हस्त से उपस्थ (शिश्न) पकड़े हुए, अंजन के समान वर्णवाला, काकोदर, कराल मुखवाला और भयानक था। उससे सड़ी दुर्गन्ध आती थी और वह द्यूत, मद्य, स्त्री तथा सुवर्ण का सेवन करने वाला था। उसने अपनी दुरुक्ति नामक बहिन से भय नामक पुत्र और मृत्यु नामक पुत्री उत्पन्न किए। उन दोनों का पुत्र निरय हुआ। उसने अपनी यातना नामक बहिन से सहस्रों रूपों वाला लोभ नामक पुत्र उत्पन्न किया। इस प्रकार कलि के वंश में असंख्य धर्मनिन्दक सन्तान उत्पन्न होती गईं।

कलिधर्म वर्णन-1

गरुड़पुराण[1] में कलिधर्म का वर्णन इस प्रकार है-


जिसमें सदा अनृत, तन्द्रा, निंद्रा, हिंसा, विवाद, शोक, मोह, भय और दैन्य बने रहते हैं, उसे कलि कहा गया है। उसमें लोग कामी और सदा कटु बोलने वाले होंगे। जनपद दस्युओं से आक्रान्त और वेद पाखण्ड से दूषित होगा। राजा लोग प्रजा का भक्षण करेंगे। ब्राह्मण शिश्नोदरपरायण होंगे। विद्यार्थी व्रतहीन और अपवित्र होंगे। गृहस्थ भिक्षा माँगेंगे। तपस्वी ग्राम में निवास करने वाले, धन जोड़ने वाले, शौर्यहीन, मायावी, दु:साहसी भृत्य (नौकर) अपने स्वामी को छोड़ देंगे। तापस सम्पूर्ण व्रतों को छोड़ देंगे। शूद्र दान ग्रहण करेंगे और तपस्वी वेश से जीविका चलायेंगे। प्रजा उद्विग्न, शोभाहीन और पिशाच सदृश होगी। बिना स्नान किए लोग भोजन, अग्नि, देवता तथा अतिथि का पूजन करेंगे। कलि के प्राप्त होने पर पितरों के लिए पिण्डोदक आदि की क्रिया न होगी। सम्पूर्ण प्रजा स्त्रियों में आसक्त और शूद्रप्राय होगी। स्त्रियाँ भी अधिक सन्तानों वाली और अल्प भाग्य वाली होंगी। खुले सिर वाली (स्वच्छन्द) और अपने सत्पति की आज्ञा का उल्लघंन करने वाली होंगी। पाखण्ड से आहत लोग विष्णु की पूजा नहीं करेंगे, किन्तु दोष से परिपूर्ण कलि में एक गुण होगा-कृष्ण के कीर्तन मात्र से मनुष्य बन्धनमुक्त हो परम गति को प्राप्त करेंगे। जो फल कृतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में पंचचर्या से प्राप्त होता है, वह कलियुग में हरि-कीर्तन से सुलभ है। इसीलिए हरि नित्य ध्येय और पूज्य हैं।


कलिधर्म वर्णन-2

भागवतपुराण[2] में कलिधर्म का वर्णन निम्नलिखित प्रकार है-


कलियुग में धर्म के तप, शौच, दया, सत्य इन चार पाँवों में केवल चौथा पाँव (सत्य) शेष रहेगा। वह भी अधार्मिकों के प्रयास से क्षीण होता हुआ, अन्त में नष्ट हो जायेगा। उसमें प्रजा लोभी, दुराचारी, निर्दय, व्यर्थ वैर करने वाली, दुर्भगा, भूरितर्ष (अत्यन्त तृषित) तथा शूद्र-दासप्रधान होगी। जिसमें माया, अनृत, तन्द्रा, निंद्रा, हिंसा, विषाद, शोक, मोह, भय, दैन्य अधिक होगा, वह तामसप्रधान कलियुग कहलायेगा। उसमें मनुष्य क्षुद्रभाग्य, अधिक खाने वाले, कामी, वित्तहीन और स्त्रियाँ स्वैरिणी और असती होंगी। जनपद दस्युओं से पीड़ित, वेद पाखण्डों से दूषित, राजा प्रजाभक्षी, द्विज शिश्नोदरपरायण, विद्यार्थी अव्रत और अपवित्र, कुटुम्बी विभाजीवी, तपस्वी ग्रामवासी और संन्यासी अर्थलोलुप होंगे। स्त्रियाँ ह्रस्वकावा, अतिभोजी, बहुत सन्तान वाली, निर्लज्ज, सदा कटु बोलने वाली, चौर्य, माया और अतिसाहस से परिपूर्ण होंगी। क्षुद्र, किराट और कूटकारी व्यापार करेंगे। लोग बिना आपदा के भी साधु पुरुषों से निन्दित व्यवसाय करेंगे।

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Thursday, 4 April 2024

Divya Drishti :- झारखंड - All District Name Of Jharkhand | Jharkhand Agriculture

 


झारखंड

झारखंड भारत का एक राज्य है, जो भूमध्य स्थल में स्थित है। यह राज्य 15 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ से अलग होकर अलग राज्य के रूप में गठित किया गया था। झारखंड का नाम 'झार' और 'खंड' के शब्दों से मिलकर बना है, जो 'वन का टुकड़ा' का अर्थ करता है, जो इसके घने जंगलों की विशेषता को दर्शाता है। झारखंड की राजधानी रांची है और यहाँ की मुख्य भाषा हिंदी और संगठित रूप से उच्चतम शैक्षणिक स्तर के लिए जाना जाता है। झारखंड में अनेक प्राचीन धरोहर और पर्यटन स्थल हैं, जो इसकी समृद्ध सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को दर्शाते हैं।

झारखंड में कुल 24 जिले हैं। निम्नलिखित हैं:

1. बोकारो
2. चाट्रा
3. देवघर
4. धनबाद
5. दुमका
6. ईस्ट सिंघभूम
7. गढ़वा
8. गिरीदीह
9. गोड्डा
10. हजारीबाग
11. जामताड़ा
12. खूंटी
13. कोडरमा
14. लटेहार
15. लोहरदगा
16. पकुड़
17. पालामू
18. रामगढ़
19. रांची
20. सहीबगंज
21. सराइकेला-खरसावां
22. सिमडेगा
23. वेस्ट सिंघभूम
24. जमशेदपुर (पूर्वी सिंहभूम)

बोकारो

बोकारो झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पूर्वी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। यह जिला उद्योग, खनन, और विभिन्न विनिर्माण क्षेत्रों के लिए प्रसिद्ध है। बोकारो जिला का मुख्यालय बोकारो नगर है। यहाँ के खानों से निकले खनिज धातुओं के उत्पादन के लिए बोकारो उद्योग धातुग्रह के रूप में प्रसिद्ध है। इसके अलावा, यहाँ धातुरहित सूड़े, साइडराइट, लाइमस्टोन, एवं कोयले का उत्पादन भी होता है। बोकारो स्टील प्लांट जिले के मुख्य आर्थिक उत्थान का केंद्र है।


चाट्रा

चाट्रा झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय चाट्रा शहर है। चाट्रा जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य, गांवों की सांस्कृतिक धरोहर, और ऐतिहासिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के पर्यटन स्थलों में पशुपतिनाथ मंदिर, राम गूफा, बेलाटु पहाड़ी, और बांधनाथ झील शामिल हैं। चाट्रा जिला की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, उद्योग, और व्यापार शामिल हैं।


देवघर

देवघर झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पूर्वी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय देवघर नगर है। देवघर जिला प्रमुखतः धार्मिक और पर्यटन स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के मुख्य धार्मिक स्थलों में बाबा बैद्यनाथ धाम, वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर, तारापीठ, और नाउका विहार शामिल हैं। इसके अलावा, देवघर जिला के विकास में कृषि, उद्योग, और पर्यटन का महत्वपूर्ण योगदान है।

धनबाद

धनबाद झारखंड राज्य का एक प्रमुख जिला है और यह झारखंड के उद्योगी एवं खनिज समृद्धि केंद्रों में से एक है। धनबाद जिला खनिज संसाधनों की बोगताना करने के लिए प्रसिद्ध है और इसे "कोयला की रानी" के नाम से जाना जाता है। यहाँ के खनिज संसाधनों में कोयला, बॉक्साइट, अंग्रेजा और चाईनी शैली के गुहाएँ, ताम्र, मैग्नीटाइट, गोल्ड, और ऊर्वरक हैं। धनबाद जिला का मुख्यालय धनबाद शहर है और यहाँ की विकास गतिविधियों में खनिज उद्योग, कृषि, और व्यापार शामिल हैं।

दुमका

दुमका झारखंड राज्य का एक जिला है, जो उत्तरी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय दुमका शहर है। यहाँ की प्रमुख आर्थिक गतिविधियों में कृषि, हाथकरघा उद्योग, और व्यापार शामिल हैं। दुमका जिला छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ की प्रमुख धार्मिक स्थलों में बासुकीनाथ मंदिर, मल्हरी मंदिर, और बसांट बाबा मंदिर शामिल हैं। दुमका जिला भी सांस्कृतिक और पर्यटन के दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

ईस्ट सिंघभूम

ईस्ट सिंघभूम झारखंड राज्य का एक जिला है, जो उत्तरी पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय बाहराघोड़ा नगर है। ईस्ट सिंघभूम जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य, वन्यजीव, और ऐतिहासिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में दलमा वन्यजीव अभयारण्य, हुगली झरना, गार्हपाँचकोट, और मातारन्गा शामिल हैं। जिले की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, माछुआ, विकास, और वन्यजीव पर्यटन शामिल हैं।

गढ़वा

गढ़वा झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय गढ़वा नगर है। गढ़वा जिला प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक स्थलों, और धार्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में पार्वती घाटी, श्रीपाडा श्री विनोबा भावे कुटीया, पटिशाहनीदेवी मंदिर, और पञ्चमारी बाबा मंदिर शामिल हैं। गढ़वा जिला की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, हाथकरघा उद्योग, और व्यापार शामिल हैं।

गिरीदीह

गिरीदीह झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पूर्वी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय गिरीदीह नगर है। यहाँ के प्रमुख आर्थिक गतिविधियों में कृषि, हाथकरघा उद्योग, और खनिज उद्योग शामिल हैं। गिरीदीह जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य और शैक्षिक संस्थाओं के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में राजमहल, हनुमान मंदिर, और कुटुम्बीनाथ मंदिर शामिल हैं। जिले में विकास की दिशा में कई योजनाएं भी चल रही हैं।


गोड्डा

गोड्डा झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय गोड्डा नगर है। गोड्डा जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में सुंदरनगर झरना, मेघा मंदिर, और बांधनाथ मंदिर शामिल हैं। गोड्डा जिला की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, हाथकरघा उद्योग, और व्यापार शामिल हैं।

हजारीबाग

हजारीबाग झारखंड राज्य का एक प्रमुख जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय हजारीबाग शहर है। हजारीबाग जिला कृषि और उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में खनिज उद्योग, सिलेक्टेड और अंगुलीय उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ, और हाथकरघा उद्योग शामिल हैं। हजारीबाग जिला के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थल हैं जैसे कि हजारीबाग झील, राजा का क्षेत्र, और नाको बिरसा मंदिर। यहाँ के विकास के कई क्षेत्र भी हैं, जैसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा, और पर्यटन।

जामताड़ा

जामताड़ा झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पूर्वी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय जामताड़ा नगर है। जामताड़ा जिला कृषि और उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में खनिज उद्योग, हाथकरघा उद्योग, और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ शामिल हैं। जामताड़ा जिला के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थल हैं जैसे कि जोना झील, जोना पड़ाव, और मंदिर। यहाँ के विकास के कई क्षेत्र भी हैं, जैसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा, और पर्यटन।

खूंटी

खूंटी झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय खूंटी नगर है। खूंटी जिला कृषि और उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में हाथकरघा उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ, और खनिज उद्योग शामिल हैं। खूंटी जिला के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थल हैं जैसे कि मेला झील, आगोरी पहाड़ी, और मंदिर। यहाँ के विकास के कई क्षेत्र भी हैं, जैसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा, और पर्यटन।

कोडरमा

कोडरमा झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय कोडरमा नगर है। कोडरमा जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य, वन्यजीव, और ऐतिहासिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में हुडुम झरना, कोडरमा वन्यजीव अभयारण्य, और माछलीघाट शामिल हैं। इसके अलावा, कोडरमा जिला की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, उद्योग, और व्यापार शामिल हैं। जिले में विकास की दिशा में कई योजनाएं भी चल रही हैं।

लटेहार

लटेहार झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय लटेहार नगर है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में माइनिंग, खनिज उद्योग, और कृषि शामिल हैं। लटेहार जिला की प्रमुख आर्थिक गतिविधियों में कृषि, हाथकरघा उद्योग, और खनिज उद्योग शामिल हैं। जिले के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थल हैं जैसे कि काली मंदिर, हरिहर धाम, और तापेश्वर शामिल हैं। यहाँ के विकास के कई क्षेत्र भी हैं, जैसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा, और पर्यटन।

लोहरदगा

लोहरदगा झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय लोहरदगा नगर है। लोहरदगा जिला कृषि और खनिज संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में माइनिंग, खनिज उद्योग, और कृषि शामिल हैं। लोहरदगा जिला की प्रमुख आर्थिक गतिविधियों में कृषि, हाथकरघा उद्योग, और खनिज उद्योग शामिल हैं। जिले के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थल हैं जैसे कि पाट्री स्थल, महादेव मंदिर, और नृत्य मंदिर। यहाँ के विकास के कई क्षेत्र भी हैं, जैसे कि स्वास्थ्य, शिक्षा, और पर्यटन।

पकुड़

पकुड़ झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पूर्वी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय पकुड़ नगर है। पकुड़ जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य, खान-पान की परंपरा, और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में भगवती स्थल, खूंटी झील, और राजा पिच्छला गड्डी शामिल हैं। जिले की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, पशुपालन, और हाथकरघा उद्योग शामिल हैं। वहाँ का स्थानीय खान-पान और स्थानीय उत्पादों का बाजार भी पर्यटकों को आकर्षित करता है।

पालामू

पालामू झारखंड राज्य का एक जिला है, जो उत्तरी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय धानबाद शहर है। पालामू जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य, वन्यजीव, और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में पालामू घाटी, पालामू वन्यजीव अभयारण्य, और श्री पशुपतिनाथ शिव मंदिर शामिल हैं। पालामू जिला की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, हाथकरघा उद्योग, और वन्यजीव पर्यटन शामिल हैं। जिले में विकास की दिशा में कई योजनाएं भी चल रही हैं।


रामगढ़

रामगढ़ झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय रामगढ़ नगर है। रामगढ़ जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक स्थलों, और धार्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में पाट्री झील, गोंडला झील, और रामगढ़ फोर्ट शामिल हैं। जिले की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, पशुपालन, और वन्यजीव पर्यटन शामिल हैं। वहाँ की स्थानीय खान-पान और हस्तशिल्प भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।


रांची

रांची झारखंड राज्य की राजधानी है और यह झारखंड का सबसे बड़ा शहर भी है। यह भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित है और झारखंड की राजनीतिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक धारा का केंद्र है। रांची एक व्यापारिक और शिक्षा केंद्र है और यहाँ कई सरकारी और निजी संस्थाएँ स्थित हैं। रांची के आस-पास कई प्राकृतिक सौंदर्य स्थल भी हैं जैसे कि रॉक गार्डन्स, हुडुम झरना, पचमार्ही, और जॉना झील। यहाँ की खासियतों में शामिल हैं उसकी विविधता, संगीत और सांस्कृतिक धरोहर।

सहीबगंज

सहीबगंज झारखंड राज्य का एक जिला है, जो उत्तरी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय सहीबगंज नगर है। सहीबगंज जिला खानिज और कृषि उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की प्रमुख खानिज धातुएं में ऊर्जा और लाइमस्टोन शामिल हैं। जिले की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, हाथकरघा उद्योग, और खनिज उद्योग शामिल हैं। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थल में वन्यजीव अभयारण्य, प्राकृतिक झरने, और मंदिर शामिल हैं। जिले में विकास की दिशा में कई योजनाएं भी चल रही हैं।

सराइकेला-खरसावां

सराइकेला-खरसावां झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय सराइकेला नगर है। सराइकेला-खरसावां जिला कृषि और उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में खनिज उद्योग, हाथकरघा उद्योग, और कृषि शामिल हैं। जिले की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, पशुपालन, और उद्योग शामिल हैं। जिले में विकास की दिशा में कई योजनाएं भी चल रही हैं।

सिमडेगा

सिमडेगा झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पूर्वी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय सिमडेगा नगर है। सिमडेगा जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य, वन्यजीव, और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में पाट्री झील, हुंटेड झील, और सिमडेगा वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं। जिले की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, हाथकरघा उद्योग, और वन्यजीव पर्यटन शामिल हैं। वहाँ की स्थानीय संस्कृति और उत्पादों का बाजार भी पर्यटकों को आकर्षित करता है।

वेस्ट सिंघभूम

वेस्ट सिंघभूम झारखंड राज्य का एक जिला है, जो पश्चिमी झारखंड क्षेत्र में स्थित है। इसका मुख्यालय चाइबासा नगर है। वेस्ट सिंघभूम जिला अपने कृषि और उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में खनिज उद्योग, हाथकरघा उद्योग, और कृषि शामिल हैं। जिले की आर्थिक गतिविधियों में कृषि, पशुपालन, और वन्यजीव पर्यटन शामिल हैं। यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में हंसदीह बिरसा मंदिर, जोना झरना, और पचमार्ही झील शामिल हैं। जिले में विकास की दिशा में कई योजनाएं भी चल रही हैं।

जमशेदपुर (पूर्वी सिंहभूम)

जमशेदपुर पूर्वी सिंहभूम जिला का एक शहर है, जो झारखंड राज्य में स्थित है। यह शहर उद्योग, शिक्षा, और पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र है। इसे भारतीय उद्योग नगरी के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यहाँ पर भारतीय उद्योग कंपनियों का बड़ा प्रतिस्थान है। जमशेदपुर खानिज, इंजीनियरिंग, और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, और टाटा पावर शामिल हैं। जमशेदपुर का सांस्कृतिक विरासत भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, और यहाँ के पर्यटन स्थलों में जमशेदपुर फिल्मीस्टान, जापानी वाणिज्यिक सेंटर, और जुबली पार्क शामिल हैं।


Monday, 1 April 2024

Divya Drishti : ओम - Om

                            




ओ३म्‌ की ध्वनि का सभी सम्प्रदायों में महत्त्व है। ॐ हिन्दू धर्म का प्रतीक चिह्न ही नहीं बल्कि हिन्दू परम्परा का सबसे पवित्र शब्द है। हमारे सभी वेदमंत्रों का उच्चारण भी ओ३म्‌ से ही प्रारंभ होता है, जो ईश्र्वरीय शक्ति की पहचान है। परमात्मा का निज नाम ओ३म्‌ है। अंग्रेज़ी में भी ईश्र्वर के लिए सर्वव्यापक शब्द का प्रयोग होता है, यही सृष्टि का आधार है। यह सिर्फ़ आस्था नहीं, इसका वैज्ञानिक आधार भी है। प्रतिदिन ॐ का उच्चारण न सिर्फ़ ऊर्जा शक्ति का संचार करता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाकर कई असाध्य बीमारियों से दूर रखने में मदद करता है। आध्यात्म में ॐ का विशेष महत्त्व है, वेद शास्त्रों में भी ॐ के कई चमत्कारिक प्रभावों का उल्लेख मिलता है। आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने भी शोध के मध्यम से ॐ के चमत्कारिक प्रभाव की पुष्टी की है। पाश्चात्य देशों में भारतीय वेद पुराण और हज़ारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति और परम्परा काफ़ी चर्चाओं और विचार विमर्श का केन्द्र रहे हैं दूसरी ओर वर्तमान की वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रेरणा स्रोत भारतीय शास्त्र और वेद ही रहे हैं, हलाकि स्पष्ट रूप से इसे स्वीकार करने से भी वैज्ञानिक बचते रहे हैं। योगियों में यह विश्वास है कि इसके अंदर मनुष्य की सामान्य चेतना को परिवर्तित करने की शक्ति है। यह मंत्र मनुष्य की बुद्धि व देह में परिवर्तन लाता है। ॐ से शरीर, मन, मस्तिष्क में परिवर्तन होता है और वह स्वस्थ हो जाता है। ॐ के उच्चारण से फेफड़ों में, हृदय में स्वस्थता आती है। शरीर, मन और मस्तिष्क स्वस्थ और तनावरहित हो जाता है। ॐ के उच्चारण से वातावरण शुद्ध हो जाता है।

ओम :- एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- ओम (बहुविकल्पी)





सभी धर्मो में ॐ

ओ३म् (ॐ) नाम में हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई जैसी कोई बात नहीं है। यह सोचना कि ओ३म् किसी एक धर्म की निशानी है, ठीक बात नहीं, अपितु यह तो तब से चला आया है जब कोई अलग धर्म ही नहीं बना था। बल्कि ओ३म् तो किसी ना किसी रूप में सभी मुख्य संस्कृतियों का प्रमुख भाग है। यह तो अच्छाई, शक्ति, ईश्वर भक्ति और आदर का प्रतीक है। उदाहरण के लिए अगर हिन्दू अपने सब मन्त्रों और भजनों में इसको शामिल करते हैं तो ईसाई और यहूदी भी इसके जैसे ही एक शब्द आमेन का प्रयोग धार्मिक सहमति दिखाने के लिए करते हैं। मुस्लिम इसको आमीन कह कर याद करते हैं, बौद्ध इसे ओं मणिपद्मे हूं कह कर प्रयोग करते हैं। सिख मत भी इक ओंकार अर्थात एक ओ३म के गुण गाता है। अंग्रेज़ी का शब्द omni, जिसके अर्थ अनंत और कभी ख़त्म न होने वाले तत्त्वों पर लगाए जाते हैं (जैसे omnipresent, omnipotent) भी वास्तव में इस ओ३म् शब्द से ही बना है। इतने से यह सिद्ध है कि ओ३म् किसी मत, मज़हब या सम्प्रदाय से न होकर पूरी इंसानियत का है। ठीक उसी तरह जैसे कि हवा, पानी, सूर्य, ईश्वर, वेद आदि सब पूरी इंसानियत के लिए हैं न कि केवल किसी एक सम्प्रदाय के लिए।


अद्भुत चिह्न

ओम का यह चिह्न 'ॐ' अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि 'ॐ' को दुनिया के सभी मंत्रों का सार कहा गया है। यह उच्चारण के साथ ही शरीर पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती है। भारतीय सभ्यता के प्रारंभ से ही ओंकार ध्वनि के महत्त्व से सभी परिचित रहे हैं। शास्त्रों में ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है। कई बार मंत्रों में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जिसका कोई अर्थ नहीं होता लेकिन उससे निकली ध्वनि शरीर पर अपना प्रभाव छोड़ती है।


उच्चारण

हिन्दू या सनातन धर्म की धार्मिक विधियों के प्रारंभ में 'ॐ' शब्द का उच्चारण होता है, जिसकी ध्वनि गहन होती है। ॐ का हिन्दू धर्म के अलावा अन्य धर्मों में भी महत्त्व है। ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक़्त 'ओ' पर ज़्यादा ज़ोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। प्राचीन भारतीय धर्म विश्वास के अनुसार ब्रह्मांड के सृजन के पहले प्रणव मंत्र का उच्चारण हुआ था। इस मंत्र का प्रारंभ है अन्त नहीं। इसके अनेकों चमत्कार है। प्रत्येक मंत्र के पूर्व इसका उच्चारण किया जाता है। योग साधना में इसका अधिक महत्त्व है। इसके निरंतर उच्चारण करते रहने से सभी प्रकार के मानसिक रोग मिट जाते हैं। ॐ को अनाहत ध्वनि (नाद) कहते हैं जो प्रत्येक व्यक्ति के भीतर और इस ब्रह्मांड में सतत गूँजता रहता है। इसके गूँजते रहने का कोई कारण नहीं। सामान्यत: नियम है कि ध्‍वनी उत्पन्न होती है किसी की टकराहट से, लेकिन अनाहत को उत्पन्न नहीं किया जा सकता। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीज़ों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है। साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना ज़रूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है, वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है, ॐ का उच्चारण करते रहना।

"जो व्यक्ति ॐ और ब्रह्म के पास रहता है, वह नदी के पास लगे वृक्षों की तरह है जो कभी नहीं मुर्झाते। -- हिन्दू नियम पुस्तिका।"


क्या करें ?

ओम - प्रातः उठकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्त संचार व्यवस्थित होगा।

ओम नमो - ओम के साथ नमो शब्द के जुड़ने से मन और मस्तिष्क में नम्रता के भाव पैदा होते हैं। इससे सकारात्मक ऊर्जा तेज़ीसे प्रवाहित होती है।

ओम नमो गणेश - गणेश आदि देवता हैं जो नई शुरुआत और सफलता का प्रतीक हैं। अत: ओम गं गणपतये नम: का उच्चारण विशेष रूप से शरीर और मन पर नियंत्रण रखने में सहायक होता है।

ॐ का भाषा अर्थ

त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक - ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है - अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।

ओ, उ और म - उक्त तीन अक्षरों वाले शब्द की महिमा अपरम्पार है। यह नाभि, हृदय और आज्ञा चक्र को जगाता है। ओ३म्‌ शब्द तीन अक्षरों एवं दो मात्राओं से मिलकर बना है जो वर्णमाला के समस्त अक्षरों में व्याप्त है। पहला शब्द है ‘अ’ जो कंठ से निकलता है। दूसरा है ‘उ’ जो हृदय को प्रभावित करता है। तीसरा शब्द ‘म्‌’ है जो नाभि में कम्पन करता है। इस सर्वव्यापक पवित्र ध्वनि के गुंजन का हमारे शरीर की नस नाडिय़ों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है विशेषकर मस्तिष्क, हृदय व नाभि केंद्र में कम्पन होने से उनमें से ज़हरीली वायु तथा व्याप्त अवरोध दूर हो जाते हैं, जिससे हमारी समस्त नाड़ियाँ शुद्ध हो जाती हैं। जिससे हमारा आभामण्डल शुद्ध हो जाता है और हमारे अन्दर छिपी हुई सूक्ष्म शक्तियाँ जागृत होती व आत्म अनुभूति होती है।

ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है। जिनका उच्चारण एक के बाद एक होता है। ओ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है, जिसके अनुसार साधक या योगी इसका उच्चारण ध्यान करने के पहले व बाद में करता है। ॐ 'ओ' से प्रारंभ होता है, जो चेतना के पहले स्तर को दिखाता है। चेतना के इस स्तर में इंद्रियाँ बहिर्मुख होती हैं। इससे ध्यान बाहरी विश्व की ओर जाता है। चेतना के इस अभ्यास व सही उच्चारण से मनुष्य को शारीरिक व मानसिक लाभ मिलता है। आगे 'उ' की ध्वनि आती है, जहाँ पर साधक चेतना के दूसरे स्तर में जाता है। इसे तेजस भी कहते हैं। इस स्तर में साधक अंतर्मुखी हो जाता है और वह पूर्व कर्मों व वर्तमान आशा के बारे में सोचता है। इस स्तर पर अभ्यास करने पर जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं व उसे आत्मज्ञान होने लगता है। वह जीवन को माया से अलग समझने लगता है। हृदय, मन, मस्तिष्क शांत हो जाता है। 'म' ध्वनि के उच्चार से चेतना के तृतीय स्तर का ज्ञान होता है, जिसे 'प्रज्ञा' भी कहते हैं। इस स्तर में साधक सपनों से आगे निकल जाता है व चेतना शक्ति को देखता है। साधक स्वयं को संसार का एक भाग समझता है और इस अनंत शक्ति स्रोत से शक्ति लेता है। इसके द्वारा साक्षात्कार के मार्ग में भी जा सकते हैं। इससे साधक के शरीर, मन, मस्तिष्क के अंदर आश्चर्यजनक परिवर्तन आता है। शरीर, मन, मस्तिष्क, शांत होकर तनावरहित हो जाता है।

ॐ उच्चारण की विधि

प्राणायाम या कोई विशेष आसन करते वक़्त इसका उच्चारण किया जाता है। केवल प्रणव साधना के लिए ॐ (ओम्) का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। साधक बैठने में असमर्थ हो तो लेटकर भी इसका उच्चारण कर सकता है। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं।

ॐ ज़ोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। बोलने की ज़रूरत जब समाप्त हो जाए तो इसे अपने अंतरमन में सुनने का अभ्यास बढ़ाएँ। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं। उच्चारण करते वक़्त लय का विशेष ध्‍यान रखें।

इसका उच्चारण सुप्रभात या संध्याकाल में ही करें। उच्चारण और आसन करने के लिए कोई एक एकांत खुला स्थान नियुक्त हो। हर कहीं इसका उच्चारण न करें। उच्चारण करते वक़्त पवित्रता और सफाई का विशेष ध्यान रखें।

किसी भी ध्वनि का प्रभाव तभी उत्पन्न होता है जब उसे विशेष लयबद्धता व श्रद्धा के साथ व्यक्त किया जाये। ‘ओ३म्‌’ ध्वनि करते हुए स्वर की मधुरता तथा उच्चारण करे तब सब ओर से विकृतियों को हटाकर एकाग्रचित होकर के उस प्रभु का प्रेम, श्रद्धा और दृढ़ विश्वास से ध्यान करें। ऐसी भावना बनाये कि वही हमारा सच्चा पिता, माता, भाई, बंधु हमारा सर्वस्व, हमारे जीवन का आधार है, अच्छा ही करता है दुःख द्वारा भी हमारे पाप कर्मों का शमन करता है व हमें पाप के बोझ से हल्का करता है। इसलिए दुःख आने पर भी उसका ही धन्यवाद करें।

ओ३म् के उच्चारण के लिए किसी निश्चित स्थान पर एकांत जगह पर आसन बिछाकर पदमासन, सुखासन में बैठे। हाथ ज्ञान मुद्रा में घुटनों पर रखे। नेत्र कोमलता से बंद करें तथा दो-तीन बार गहरे लम्बे श्वास लें और श्वास गहरा भरे, बिना मुंह खोलकर व बोलकर ओ का उच्चारण करें। कंठ से स्पंदन हो और इसके बाद होठ बंद करते हुए म का गुंजन करे। धीरे-धीरे लंबा गुंजन का अभ्यास करे। जब तक आनन्द मिलता रहे तो उस आसन को करते रहो। इसे नियमित श्रद्धाभाव और प्रसन्न-चित्त होकर करें। ब्रह्म-मुहूर्त में करने पर आनन्द मिलता है। अंत में कुछ देर के लिए शांत बैठे। इससे शरीर को अनेक प्रकार से लाभ होता है तथा शरीर के कोषाणुओं का नव निर्माण होता है। शरीर स्वस्थ, सुंदर तथा पवित्र बनता है। कंठ नली में स्वर तन्तु की ट्यूनिंग होती है, फेफडों की कार्य क्षमता बढती है। आसनों के करने से अनेक प्रकार के विकार दूर होते हैं तथा रक्त की शुद्धि होती है। हृदय को कम काम करना पडता है। उससे विश्राम भी मिलता है। पाचन क्रिया सुधरती है तथा निकासन प्रणाली सुचारु रूप से कार्य करती है। ग्रंथियों से संतुलित स्त्राव निकलता है। मन की शक्ति बढती है, मन हल्का, प्रसन्न व पवित्र बनता है। एक मंगलमय वातावरण निर्मित होता है तथा हर प्रकार का तनाव दूर होता है। दमा, रक्तचाप आदि ठीक हो जाते हैं। नर को नारायण की ओर बढाने की क्षमता ओंकार ध्वनि में है। बुद्धि तीव्र, स्मरण शक्ति का विकास तथा निर्णायक क्षमता की वृद्धि होती है और तन, मन, बुद्धि को स्वस्थ रखती है।

ॐ उच्चारण से लाभ




संसार की समस्त ध्वनियों से अधिक शक्तिशाली, मोहक, दिव्य और सर्वश्रेष्ठ आनंद से युक्त नाद ब्रह्म के स्वर से सभी प्रकार के रोग और शोक मिट जाते हैं। इससे हमारे शरीर की ऊर्जा संतुलन में आ जाती है। इसके संतुलन में आने पर चित्त शांत हो जाता है। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होती है। इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलती है। व्यर्थ के मानसिक द्वंद्व, तनाव और नकारात्मक विचार मिटकर मन की शक्ति बढ़ती है। मन की शक्ति बढ़ने से संकल्प और आत्मविश्वास बढ़ता है। सम्मोहन साधकों के लिए इसका निरंतर जाप करना उत्तम है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं।
बीमारी दूर भगाएँ :-- तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्त्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं। सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है।
ॐ उच्चारण से शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव :-- शब्दों से उत्पन्न ध्वनि से श्रोता के शरीर और मस्तिष्क पर सीधा प्रभाव पड़ता है। बोलने वाले के मुँह से शब्द निकलने से पहले उसके मस्तिष्क से विद्युत तरंगें निकलती हैं। इन्हें श्रोता का मस्तिष्क ग्रहण करने की चेष्टा करता है। उच्चारित शब्द श्रोता के कर्ण-रंध्रों के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचते हैं। प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक' पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह आल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है।
ओ३म् के उच्चारण / ध्वनि से मनुष्य का कई शारीरिक, मानसिक, और आत्मिक विकास होता हैं। साथ ही इसके अभ्यास से अनेक प्रकार के रोगों से भी मुक्ति मिलती है। यहाँ तक कि यदि आपको अर्थ भी मालूम नहीं तो भी इसके उच्चारण से शारीरिक लाभ तो होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। ओ३म् इस ब्रह्माण्ड में उसी तरह भर रहा है कि जैसे आकाश। ओ३म् का उच्चारण करने से जो आनंद और शान्ति अनुभव होती है, वैसी शान्ति किसी और शब्द के उच्चारण से नहीं आती। यही कारण है कि सब जगह बहुत लोकप्रिय होने वाली आसन प्राणायाम की कक्षाओं में ओ३म के उच्चारण का बहुत महत्त्व है। बहुत मानसिक तनाव और अवसाद से ग्रसित लोगों पर कुछ ही दिनों में इसका जादू सा प्रभाव होता है। यही कारण है कि आजकल डॉक्टर आदि भी अपने मरीज़ों को आसन प्राणायाम की शिक्षा देते हैं।
ओ३म् के उच्चारण के शारीरिक लाभ -
1.अनेक बार ओ३म् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।
2.अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ओ३म् के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।
3.यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।
4.यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।
5.इससे पाचन शक्ति तेज़ होती है।
6.इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।
7.थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।
8.नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी।
9.कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है। इत्यादि इत्यादि।

ओ३म् के उच्चारण से मानसिक लाभ -

जीवन जीने की शक्ति और दुनिया की चुनौतियों का सामना करने का अपूर्व साहस मिलता है।
इसे करने वाले निराशा और गुस्से को जानते ही नहीं।
प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल और नियंत्रण होता है। परिस्थितियों को पहले ही भांपने की शक्ति उत्पन्न होती है।
आपके उत्तम व्यवहार से दूसरों के साथ सम्बन्ध उत्तम होते हैं। शत्रु भी मित्र हो जाते हैं।
जीवन जीने का उद्देश्य पता चलता है जो कि अधिकाँश लोगों से ओझल रहता है।
इसे करने वाला व्यक्ति जोश के साथ जीवन बिताता है और मृत्यु को भी ईश्वर की व्यवस्था समझ कर हँस कर स्वीकार करता है।
जीवन में फिर किसी बात का डर ही नहीं रहता।
आत्महत्या जैसे कायरता के विचार आस पास भी नहीं फटकते। बल्कि जो आत्महत्या करना चाहते हैं, वे एक बार ओ३म् के उच्चारण का अभ्यास 4 दिन तक कर लें। उसके बाद खुद निर्णय कर लें कि जीवन जीने के लिए है कि छोड़ने के लिए।
ओ३म् के उच्चारण के आध्यात्मिक (रूहानी) लाभ -
1.इसे करने से ईश्वर / अल्लाह से सम्बन्ध जुड़ता है और लम्बे समय तक अभ्यास करने से ईश्वर/अल्लाह को अनुभव (महसूस) करने की ताकत पैदा होती है।
2.इससे जीवन के उद्देश्य स्पष्ट होते हैं और यह पता चलता है कि कैसे ईश्वर सदा हमारे साथ बैठा हमें प्रेरित कर रहा है।
3.इस दुनिया की अंधी दौड़ में खो चुके खुद को फिर से पहचान मिलती है। इसे जानने के बाद आदमी दुनिया में दौड़ने के लिए नहीं दौड़ता किन्तु अपने लक्ष्य के पाने के लिए दौड़ता है।
5.इसके अभ्यास से दुनिया का कोई डर आसपास भी नहीं फटक सकता मृत्यु का डर भी ऐसे व्यक्ति से डरता है क्योंकि काल का भी काल जो ईश्वर है, वो सब कालों में मेरी रक्षा मेरे कर्मानुसार कर रहा है, ऐसा सोच कर व्यक्ति डर से सदा के लिए दूर हो जाता है। जैसे महायोगी श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध के वातावरण में भी नियमपूर्वक ईश्वर का ध्यान किया करते थे। यह बल व निडरता ईश्वर से उनकी निकटता का ही प्रमाण है। 

इसके अभ्यास से वह कर्म फल व्यवस्था स्पष्ट हो जाती है कि जिसको ईश्वर ने हमारे भले के लिए ही धारण कर रखा है। जब पवित्र ओ३म् के उच्चारण से हृदय निर्मल होता है तब यह पता चलता है कि हमें मिलने वाला सुख अगर हमारे लिए भोजन के समान सुखदायी है तो दुःख कड़वा होते हुए भी औषधि के समान सुखदायी है जो आत्मा के रोगों को नष्ट कर दोबारा इसे स्वस्थ कर देता है। इस तरह ईश्वर के दंड में भी उसकी दया का जब बोध जब होता है तो उस परम दयालु जगत माता को देखने और पाने की इच्छा प्रबल हो जाती है और फिर आदमी उसे पाए बिना चैन से नहीं बैठ सकता। इस तरह व्यक्ति मुक्ति के रास्तों पर पहला क़दम धरता है।

ॐ का वैज्ञानिक महत्त्व



आइंस्टाइन यही कह कर गए हैं कि ब्राह्मांड फैल रहा है। आइंस्टाइन से पूर्व भगवान महावीर ने कहा था। महावीर से पूर्व वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। महावीर ने वेदों को पढ़कर नहीं कहा, उन्होंने तो ध्यान की अतल गहराइयों में उतर कर देखा तब कहा।
खगोल वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि हमारे अंतरिक्ष में पृथ्वी मण्डल, सौर मण्डल, सभी ग्रह मण्डल तथा अनेक आकाशगंगाएं, लगातार ब्रह्माण्ड का चक्कर लगा रही हैं। ये सभी आकाशीय पिण्ड कई हज़ार मील प्रति सेकेण्ड की गति से अनंत की ओर भागे जा रहे हैं, जिससे लगातार एक कम्पन, एक ध्वनि अथवा शोर उत्पन्न हो रहा है इसी ध्वनि को हमारे तपस्वी और ऋषि - महर्षियों ने अपनी ध्यानावस्था में सुना। जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ब्रह्मानाद अथवा ॐ कहा । यानी अंतरिक्ष में होने वाला मधुर गीत ‘ओ३म्‌’ ही अनादिकाल से अनन्त काल तक ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। ओ३म्‌ की ध्वनि या नाद ब्रह्माण्ड में प्राकृतिक ऊर्जा के रूप में फैला हुआ है जब हम अपने मुख से एक ही सांस में ओ३म्‌ का उच्चारण मस्तिष्क ध्वनि अनुनाद तकनीक से करते हैं तों मानव शरीर को अनेक लाभ होते हैं और वह असीम सुख, शांति व आनन्द की अनुभूति करता है।

ओ३म्‌ के संबंध में यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या ओ३म्‌ शब्द की महिमा का कोई वैज्ञानिक आधार हैं? क्या इसके उच्चारण से इस असार संसार में भी कुछ लाभ है? इस संबंध में ब्रिटेन के एक साईटिस्ट जर्नल ने शोध परिणाम बताये हैं जो यहां प्रस्तुत हैं। रिसर्च एंड इंस्टीट्‌यूट ऑफ न्यूरो साइंस के प्रमुख प्रोफ़ेसर जे. मार्गन और उनके सहयोगियों ने सात वर्ष तक ‘ओ३म्‌’ के प्रभावों का अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने मस्तिष्क और हृदय की विभिन्न बीमारियों से पीडि़त 2500 पुरुषो और 200 महिलाओं का परीक्षण किया। इनमें उन लोगों को भी शामिल किया गया जो अपनी बीमारी के अन्तिम चरण में पहुँच चुके थे। इन सारे मरीज़ों को केवल वे ही दवाईयां दी गई जो उनका जीवन बचाने के लिए आवश्यक थीं। शेष सब बंद कर दी गई। सुबह 6 - 7 बजे तक यानी कि एक घंटा इन लोगों को साफ, स्वच्छ, खुले वातावरण में योग्य शिक्षकों द्वारा ‘ओ३म्‌’ का जप कराया गया। इन दिनों उन्हें विभिन्न ध्वनियों और आवृतियो में ‘ओ३म्‌’ का जप कराया गया। हर तीन माह में हृदय, मस्तिष्क के अलावा पूरे शरीर का ‘स्कैन’ कराया गया। चार साल तक ऐसा करने के बाद जो रिपोर्ट सामने आई वह आश्चर्यजनक थी। 70 प्रतिशत पुरुष और 85 प्रतिशत महिलाओं से ‘ओ३म्‌’ का जप शुरू करने के पहले बीमारियों की जो स्थिति थी उसमें 90 प्रतिशत कमी दर्ज की गई। कुछ लोगों पर मात्र 20 प्रतिशत ही असर हुआ। इसका कारण प्रोफ़ेसर मार्गन ने बताया कि उनकी बीमारी अंतिम अवस्था में पहुंच चुकी थी। इस प्रयास से यह परिणाम भी प्राप्त हुआ कि नशे से मुक्ति भी ‘ओ३म्‌’ के जप से प्राप्त की जा सकती है। इसका लाभ उठाकर जीवन भर स्वस्थ रहा जा सकता है। ॐ को लेकर प्रोफ़ेसर मार्गन कहते हैं कि शोध में यह तथ्य पाया कि ॐ का जाप अलग अलग आवृत्तियों और ध्वनियों में दिल और दिमाग के रोगियों के लिए बेहद असर कारक है यहाँ एक बात बेहद गौर करने लायक़ यह है जब कोई मनुष्य ॐ का जाप करता है तो यह ध्वनि जुबां से न निकलकर पेट से निकलती है यही नहीं ॐ का उच्चारण पेट, सीने और मस्तिष्क में कम्पन पैदा करता है विभिन्न आवृतियो (तरंगों) और ‘ओ३म्‌’ ध्वनि के उतार चढ़ाव से पैदा होने वाली कम्पन क्रिया से मृत कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर देता है तथा नई कोशिकाओं का निर्माण करता है रक्त विकार होने ही नहीं पाता। मस्तिष्क से लेकर नाक, गला, हृदय, पेट और पैर तक तीव्र तरंगों का संचार होता है। रक्त विकार दूर होता है और स्फुर्ती बनी रहती है। यही नहीं आयुर्वेद में भी ॐ के जाप के चमत्कारिक प्रभावों का वर्णन है। इस तरह के कई प्रयोगों के बाद भारतीय आध्यात्मिक प्रतीक चिह्नों को के प्रति पश्चिम देशों के लोगों में भी खुलापन देखा गया।
अभी हाल ही में हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हारबर्ट बेन्सन ने अपने लबे समय के शोध कार्य के बाद ‘ओ३म्‌’ के वैज्ञानिक आधार पर प्रकाश डाला है। थोड़ी प्रार्थना और ओ३म्‌ शब्द के उच्चारण से जानलेवा बीमारी एड्‌स के लक्षणों से राहत मिलती है तथा बांझपन के उपचार में दवा का काम करता है। इसके अलावा आप स्वयं ‘ओ३म्‌’ जप करके ओ३म्‌ ध्वनि के परिणाम देख सकते हैं। इसके जप से सभी रोगों में लाभ व दुष्कर्मों के संस्कारों को शमन होता है। अतः ओ३म्‌ की चमत्कारिक ध्वनि का उच्चारण (जाप) यदि मनुष्य अटूट श्रद्धा व पूर्ण विश्वास के साथ करे तो अपने लक्ष्य को प्राप्त कर जीवन को सार्थक कर सकता है।