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Showing posts from December 3, 2023

कर्मकाण्ड

  कर्मकाण्ड का मूलत: सम्बन्ध मानव के सभी प्रकार के कर्मों से है, जिनमें धार्मिक क्रियाएँ भी सम्मिलित हैं। स्थूल रूप से धार्मिक क्रियाओं को ही 'कर्मकाण्ड' कहते हैं, जिससे पौरोहित्य का घना सम्बन्ध है। कर्मकाण्ड के भी दो प्रकार हैं- 1.इष्ट 2.पूर्त सम्पूर्ण वैदिक धर्म तीन काण्डों में विभक्त है - 1.ज्ञान काण्ड, 2.उपासना काण्ड 3.कर्म काण्ड यज्ञ-यागादि, अदृष्ट और अपूर्व के ऊपर आधारित कर्मों को इष्ट कहते हैं। लोक-हितकारी दृष्ट फल वाले कर्मों को पूर्त कहते हैं। इस प्रकार कर्मकाण्ड के अंतर्गत लोक-परलोक-हितकारी सभी कर्मों का समावेश है। कर्मकाण्ड वेदों के सभी भाष्यकार इस बात से सहमत हैं कि चारों वेदों में प्रधानत: तीन विषयों; कर्मकाण्ड, ज्ञान- काण्ड एवं उपासनाकाण्ड का प्रतिपादन है। कर्मकाण्ड अर्थात् यज्ञकर्म वह है जिससे यजमान को इस लोक में अभीष्ट फल की प्राप्ति हो और मरने पर यथेष्ट सुख मिले। यजुर्वेद के प्रथम से उंतालीसवें अध्याय तक यज्ञों का ही वर्णन है। अंतिम अध्याय(40 वाँ) इस वेद का उपसंहार है, जो 'ईशावास्योपनिषद्' कहलाता है। वेद का अधिकांश कर्मकाण्ड और उपासना से परिपूर्ण है, श...

कर्म

  कर्म अर्थात् वह जो किया जाये। काम या करनी। वे कार्य जो नैतिक या धार्मिक दृष्टि से कर्तव्य समझकर करने होते हैं। जैसे- विद्वानों का अध्यापन। वे धार्मिक कार्य जो शास्त्रीय विधि-विधान से करने होते हैं अर्थात् शास्त्रविहित कर्म। जैसे- विवाह कर्म, अंत्येष्टि कर्म आदि। 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के अनुसार कर्म दो प्रकार के होते हैं- शुभ अशुभ वेदोक्त कर्म शुभ हैं। इनके प्रभाव से प्राणी कल्याण के भागी होते हैं। वेद में जिसका स्थान नहीं है, वह अशुभ कर्म नरकप्रद है।

तंत्र

  तंत्र (संस्कृत शब्द, अर्थात् तंतु) कुछ हिंदू, बौद्ध या जैन संप्रदायों के रहस्यमय आचरणों से संबंधित कई ग्रंथों में से एक है। हिंदू धार्मिक साहित्य के परंपरागत वर्गीकरण में पुराणों (पौराणिक कथाओं, अनुश्रुतियों और अन्य विषयों के मध्य कालीन अतिव्यापक संकलन) की तरह उत्तर वैदिक संस्कृत ग्रंथों के एक वर्ग को तंत्र कहा जाता है। इस प्रयोग में तंत्र सैद्धांतिक रूप से धर्मशास्त्र, मंदिरों एवं मूर्तियों के निर्माण तथा धार्मिक आचरण के प्रतिपादक हैं, किंतु वास्तव में जादू-टोना, अनुष्ठानों और प्रतीकों जैसे हिंदू धर्म के लोकप्रिय पहलुओं से संबद्ध हैं। हिंदू सांप्रदायिक सारणी के अनुरूप वे शैव आगमों, वैष्णव संहिताओं और शाक्त तंत्रों में विभक्त हैं। शाक्त तंत्र शाक्त तंत्रों की सूचियां एक-दूसरे से काफ़ी भिन्न हैं, लेकिन संकेत मिलते हैं कि प्रारंभिक पांडुलिपियां क़रीब सातवीं सदी की है। वे देवी शक्ति को देवी सर्जन शक्ति या ऊर्जा का नारी स्वरूप मानते हैं। इस अवधारणा का मानना है कि अपनी शक्ति के बिना शिव शव हैं। योग से संबद्ध तंत्रों में शक्ति का तादाम्य कुंडलिनी से किया गया है; वह ऊर्जा, जो (मेरुदंड)...

कुंडलिनी

  कुंडलिनी   परमेश्वर की चिद्रूपा परमाशक्ति प्रति जीवदेह में सोई पड़ी है। इसका नाम कुंडलिनी या कुलकुंडलिनी शक्ति है। यद्यपि जीव स्वरूपत: शिवरूप हैं, फिर भी जब तक यह शक्ति जगती नहीं तब तक वे आत्मविस्मृत रहते हैं एवं पशु के सदृश वेद्य शक्तियों द्वारा संचालित हो जड़वत स्थित रहते हैं। क्रमविकास के नियमानुसार 84 लाख योनियों का अतिक्रम हो जाने पर जब पशुभाव हटाने योग्य मनुष्यदेह की प्राप्ति होती है तब अहंभाव का उदय और कर्म में अधिकार उत्पन्न होता है। कुंडलिनी शक्ति मानवदेह में मेरु दंड के नीचे मूलाधार नामक चतुर्दश कुलकमल की कर्णिका में त्रिकोशस्थ अधोमुख स्वयंभूलिंग का साढ़े तीन वलयों के रूप में वेष्टन कर अपने मुंह से ब्रह्मद्वार को ढककर सोई हुई है। दीर्घकालव्यापी तपस्या के प्रभाव से तथा भगवदनुग्रह होने पर इस शक्ति का जागरण होता है। उस समय वह सुप्तावस्था के कुंडलभाव का त्याग कर सरल गति से मेरुदंड के भीतर सषुम्ना नाड़ी का आश्रय पाकर ऊपर की ओर उठने लगती है और इसके साथ ही सत्व का विकास, भोगों में वैराग्य, विवेक, ज्ञान आदि सद्गुणों का आविर्भाव होने लगता है। ध्वन्यात्मक और वर्णात्मक सब प्र...