Friday, 8 December 2023

कर्मकाण्ड

 कर्मकाण्ड का मूलत: सम्बन्ध मानव के सभी प्रकार के कर्मों से है, जिनमें धार्मिक क्रियाएँ भी सम्मिलित हैं। स्थूल रूप से धार्मिक क्रियाओं को ही 'कर्मकाण्ड' कहते हैं, जिससे पौरोहित्य का घना सम्बन्ध है। कर्मकाण्ड के भी दो प्रकार हैं-


1.इष्ट

2.पूर्त


सम्पूर्ण वैदिक धर्म तीन काण्डों में विभक्त है-


1.ज्ञान काण्ड,

2.उपासना काण्ड

3.कर्म काण्ड


यज्ञ-यागादि, अदृष्ट और अपूर्व के ऊपर आधारित कर्मों को इष्ट कहते हैं। लोक-हितकारी दृष्ट फल वाले कर्मों को पूर्त कहते हैं। इस प्रकार कर्मकाण्ड के अंतर्गत लोक-परलोक-हितकारी सभी कर्मों का समावेश है।


कर्मकाण्ड वेदों के सभी भाष्यकार इस बात से सहमत हैं कि चारों वेदों में प्रधानत: तीन विषयों; कर्मकाण्ड, ज्ञान- काण्ड एवं उपासनाकाण्ड का प्रतिपादन है।


कर्मकाण्ड अर्थात् यज्ञकर्म वह है जिससे यजमान को इस लोक में अभीष्ट फल की प्राप्ति हो और मरने पर यथेष्ट सुख मिले। यजुर्वेद के प्रथम से उंतालीसवें अध्याय तक यज्ञों का ही वर्णन है। अंतिम अध्याय(40 वाँ) इस वेद का उपसंहार है, जो 'ईशावास्योपनिषद्' कहलाता है।


वेद का अधिकांश कर्मकाण्ड और उपासना से परिपूर्ण है, शेष अल्पभाग ही ज्ञानकाण्ड है।


कर्मकाण्ड कनिष्ठ अधिकारी के लिए है। उपासना और कर्म मध्यम के लिए। कर्म, उपासना और ज्ञान तीनों उत्तम के लिए हैं। पूर्वमीमांसाशास्त्र कर्मकाण्ड का प्रतिपादन है।


इसका नाम 'पूर्वमीमांसा' इस लिए पड़ा कि कर्मकाण्ड मनुष्य का प्रथम धर्म है, ज्ञानकाण्ड का अधिकार उसके उपरांत आता है।


पूर्व आचरणीय कर्मकाण्ड से सम्बन्धित होने के कारण इसे पूर्वमीमांसा कहते हैं। ज्ञानकाण्ड-विषयक मीमांसा का दूसरा पक्ष 'उत्तरमीमांसा' अथवा वेदान्त कहलाता है।






कर्म

 कर्म अर्थात् वह जो किया जाये। काम या करनी। वे कार्य जो नैतिक या धार्मिक दृष्टि से कर्तव्य समझकर करने होते हैं। जैसे- विद्वानों का अध्यापन।


वे धार्मिक कार्य जो शास्त्रीय विधि-विधान से करने होते हैं अर्थात् शास्त्रविहित कर्म। जैसे- विवाह कर्म, अंत्येष्टि कर्म आदि।

'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के अनुसार कर्म दो प्रकार के होते हैं-

शुभ

अशुभ

वेदोक्त कर्म शुभ हैं। इनके प्रभाव से प्राणी कल्याण के भागी होते हैं। वेद में जिसका स्थान नहीं है, वह अशुभ कर्म नरकप्रद है।

तंत्र

 तंत्र (संस्कृत शब्द, अर्थात् तंतु) कुछ हिंदू, बौद्ध या जैन संप्रदायों के रहस्यमय आचरणों से संबंधित कई ग्रंथों में से एक है। हिंदू धार्मिक साहित्य के परंपरागत वर्गीकरण में पुराणों (पौराणिक कथाओं, अनुश्रुतियों और अन्य विषयों के मध्य कालीन अतिव्यापक संकलन) की तरह उत्तर वैदिक संस्कृत ग्रंथों के एक वर्ग को तंत्र कहा जाता है। इस प्रयोग में तंत्र सैद्धांतिक रूप से धर्मशास्त्र, मंदिरों एवं मूर्तियों के निर्माण तथा धार्मिक आचरण के प्रतिपादक हैं, किंतु वास्तव में जादू-टोना, अनुष्ठानों और प्रतीकों जैसे हिंदू धर्म के लोकप्रिय पहलुओं से संबद्ध हैं। हिंदू सांप्रदायिक सारणी के अनुरूप वे शैव आगमों, वैष्णव संहिताओं और शाक्त तंत्रों में विभक्त हैं।


शाक्त तंत्र

शाक्त तंत्रों की सूचियां एक-दूसरे से काफ़ी भिन्न हैं, लेकिन संकेत मिलते हैं कि प्रारंभिक पांडुलिपियां क़रीब सातवीं सदी की है। वे देवी शक्ति को देवी सर्जन शक्ति या ऊर्जा का नारी स्वरूप मानते हैं। इस अवधारणा का मानना है कि अपनी शक्ति के बिना शिव शव हैं। योग से संबद्ध तंत्रों में शक्ति का तादाम्य कुंडलिनी से किया गया है; वह ऊर्जा, जो (मेरुदंड) के आधार पर तब तक कुंडली के रूप में रहती है, जब तक कि यौगिक साधना द्वारा उसे शरीर से गुज़ारते हुए ऊपर नहीं लाया जाता। तंत्र पद्धति यंत्रों एवं मंडलों (आनुष्ठानिक रेखाचित्र) और मंत्रों (गूढ़ अक्षर या पवित्र सूत्र) पर भी ज़ोर देते हैं। शाक्त तंत्रों में प्रमुख है : कुलर्णव, जो ‘वाम हस्त’ कर्मकांडों, जैसे आनुष्ठानिक मैथुन का प्रतिपादन करते हैं; कुलचूड़ामणि में अनुष्ठानों की चर्चा की गई है और शारदातिलक में विशेष रूप से जादू-टोने का वर्णन है।


तंत्रशास्त्र

तंत्र को तंत्रशास्त्र शिवप्रणीत भी कहा जाता है। तंत्रशास्त्र तीन भागों में विभक्त है,


(1)आगम तन्त्र

वाराहीतंत्र के अनुसार जिसमें सृष्टि प्रलय, देवताओं की पूजा, सत्कर्यों के साधन, पुरश्चरण, षट्कर्मसाधन और चार प्रकार के ध्यानयोग का वर्णन हो उसे 'आगम' कहते है।


(2)यामल तन्त्र

तंत्रशास्त्र में सृष्टितत्त्व, ज्योतिष, नित्य कृत्य, क्रम, सूत्र, वर्णभेद और युगधर्म का वर्णन हो उसे 'यामल' कहते है।


(3)मुख्य तन्त्र

तंत्रशास्त्र सृष्टि, लय, मन्त्र, निर्णय, तीर्थ, आश्रमधर्म, कल्प, ज्योतिषसंस्थान, व्रतकथा, शौच-अशौच, स्त्रीपुरुषलक्षण, राजधर्म, दानधर्म, युगधर्म, व्यवहार तथा आध्यात्मिक नियमों का वर्णन हो, वह 'मुख्य तंत्र' कहलाता है।


सिद्धांत

तंत्रशास्त्र के सिद्धांतानुसार कलियुग में वैदिक मंत्रों, जपों और यज्ञों आदि का फल नहीं होता इस युग में सब प्रकार के कार्यों की सिद्धि के लिए तंत्रशास्त्र में वर्णिक मंत्रों और उपायों आदि से ही सफलता मिलती है।


तंत्रशास्त्र के सिद्धांत बहुत गुप्त रखे जाते है। और इसकी शिक्षा लेने के लिए मनुष्य को पहले दीक्षित होना पड़ता है, आजकल प्राय: मारण, उच्चाटन, वशीकरण आदि के लिए तथा अनेक प्रकार की सिद्धियों के लिए तंत्रोक्त मंत्रों और क्रियाओं का प्रयोग किया जाता है। तंत्रशास्त्र प्रधानत: शाक्तों (देवी-उपासकों) का है और इसके मंत्र प्राय: अर्थहीन और एकाक्षरी हुआ करते है। जैसे- ह्नीं,क्लीं, श्रीं, ऐं, क्रूं आदि। तांत्रिकों का पच्च मकार सेवन (मद्य, मांस, मत्स्य आदि) तथा चक्र-पूजा का विधान स्वतंत्र होता है। अथर्ववेद में भी मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि का विधान है, परंतु कहते हैं कि वैदिक क्रियाओं और तंत्र-मंत्रादि विधियों को महादेव जी ने कीलित कर दिया है और भगवती उमा के आग्रह से ही कलियुग के लिए तंत्रों की रचना की है। बौद्धमत में भी तंत्रशास्त्र एक ग्रंथ है। उनका प्रचार चीन और तिब्बत में है। हिन्दू तांत्रिक उन्हें उपतंत्र कहते हैं। तंत्रशास्त्र की उत्पत्ति कब से हुई इसका निर्णय नहीं हो सकता। प्राचीन स्मृतियों में चौदह विद्याओं का उल्लेख है किंतु उनमें तंत्र गृहीत नहीं हुआ है। इनके सिवा किसी महापुराण में भी तंत्रशास्त्र का उल्लेख नहीं है। इसी तरह के कारणों से तंत्रशास्त्र को प्राचीन काल में विकसित शास्त्र नहीं माना जा सकता।


अथर्ववेदीय नृसिंहतापनीयोपनिषद में सबसे पहले तंत्र का लक्षण देखने में आता है। इस उपनिषद में मंत्रराज नरसिंह- अनुष्टुप प्रसंग में तांत्रिक महामंत्र का स्पष्ट आभास सूचित हुआ है। शंकराचार्य ने भी जब उक्त उपनिषद के भाष्य की रचना की है तब निस्सन्देह वह 8वीं शताब्दी से पहले की है। हिन्दुओं के अनुकरण से बौद्ध तंत्रों की रचना हुई है। 10वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के भीतर बहुत से बौद्ध तंत्रों का तिब्बतीय भाषा में अनुवाद हुआ था। ऐसी दशा में मूल बौद्ध तंत्र 8वीं शताब्दी के पहले और उनके आदर्श हिन्दू तंत्र बौद्ध तंत्रों से भी पहले प्रकटिक हुए हैं, इसमें सन्देह नहीं। तंत्रों के मत से सबसे पहले दीक्षा ग्रहण करके तांत्रिक कार्यों में हाथ डालना चाहिए। बिना दीक्षा के तांत्रिक कार्य में अधिकार नहीं है। तांत्रिक गण पाँच प्रकार के आचारों में विभक्त हैं, ये श्रेष्ठता के क्रम से निम्नोक्त हैं वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, दक्षिणाचार, वामाचार, सिद्धांताचार एवं कौलाचार। ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठ माने जाते हैं।


बौद्ध तंत्र

बौद्ध तंत्र सातवीं सदी या पहले के हैं व तथागतह्मका एक प्रारंभिक एवं उत्कृष्ट रचना है। क़रीब नौवीं सदी के बाद इन रचनाओं का तिब्बती और चीनी भाषा में अनुवाद किया गया और कुछ तो अब इन्हीं भाषाओं में संरक्षित हैं, क्योंकि मूल संस्कृत रचनाएं खो चुकी हैं। बौद्ध तंत्रों में महत्त्वपूर्ण रचना कालचक्र-तंत्र है।

कुंडलिनी

 कुंडलिनी परमेश्वर की चिद्रूपा परमाशक्ति प्रति जीवदेह में सोई पड़ी है। इसका नाम कुंडलिनी या कुलकुंडलिनी शक्ति है। यद्यपि जीव स्वरूपत: शिवरूप हैं, फिर भी जब तक यह शक्ति जगती नहीं तब तक वे आत्मविस्मृत रहते हैं एवं पशु के सदृश वेद्य शक्तियों द्वारा संचालित हो जड़वत स्थित रहते हैं। क्रमविकास के नियमानुसार 84 लाख योनियों का अतिक्रम हो जाने पर जब पशुभाव हटाने योग्य मनुष्यदेह की प्राप्ति होती है तब अहंभाव का उदय और कर्म में अधिकार उत्पन्न होता है। कुंडलिनी शक्ति मानवदेह में मेरु दंड के नीचे मूलाधार नामक चतुर्दश कुलकमल की कर्णिका में त्रिकोशस्थ अधोमुख स्वयंभूलिंग का साढ़े तीन वलयों के रूप में वेष्टन कर अपने मुंह से ब्रह्मद्वार को ढककर सोई हुई है।

दीर्घकालव्यापी तपस्या के प्रभाव से तथा भगवदनुग्रह होने पर इस शक्ति का जागरण होता है। उस समय वह सुप्तावस्था के कुंडलभाव का त्याग कर सरल गति से मेरुदंड के भीतर सषुम्ना नाड़ी का आश्रय पाकर ऊपर की ओर उठने लगती है और इसके साथ ही सत्व का विकास, भोगों में वैराग्य, विवेक, ज्ञान आदि सद्गुणों का आविर्भाव होने लगता है। ध्वन्यात्मक और वर्णात्मक सब प्रकार के शब्दों तथा शुद्ध और अशुद्ध सब प्रकार की सृष्टियों का यही मूल है। यह बिंदु, महामाया तथा चिदाकाश के नाम से आगमों में प्रसिद्ध है। सद्गुरु का अनुग्रह होने पर उनसे प्रेरित चित्‌शक्ति के आघात को प्राप्त होकर यह अनादि निद्रा से जाग उठती है। नाद तथा ज्योति बिखरेती हुई यह मूलाधार से आज्ञाचक्र पर्यंत छह चक्रों का विद्युच्छिखा की भांति उल्लंघन कर भ्रूमध्यस्थ बिंदुस्थान में प्रकट होती है और अंत में ज्ञानचक्षु या तृतीय नेत्र का उन्मीलन करती है। तदुपरांत शिवशक्तिमय माहनाद का भेदकर शखिनी नाड़ी के शिखर में स्थित शून्य स्थान में ब्रह्मरध्रांतर्गत विसर्ग के निम्न प्रदेश में चिंदात्मक चंद्रमंडल में प्रविष्ट हो जाती है। इस मंडल में अत्यंत गुप्त शून्य स्थान में परमबिंदु अवस्थित है। इस महाज्ञान के अवलंबन से परमसंज्ञा के साक्षात्कार का मार्ग खुल जाता है।

सहस्रार के मध्यबिंदु में सत्‌ और चित्‌ सदा शिव शुद्ध विद्या के रूप में विराजमान रहते हैं। यह विद्या चंद्रमा की षोडश कला कही जाती है। सत्‌ तथा चित्‌ की नित्ययुक्तावस्था ही सामरस्य अथवा परमानंद है। यही योगी का परम लक्ष्य है। उत्थित कुंडलिनी की इस योगभूमि में स्थायी रूप से प्रतिष्ठित होने पर योगी का योगसाधन भलीभाँति सिद्ध हो जाता है।

कुंडलिनी के अध: तथा ऊर्ध्व के भेद से दो प्रकार हैं। अध: कुंडलिनी का दूसरा नाम है योगिनी चक्र। इसी स्थान में चिदग्नि की अभिव्यक्ति होती है। यह शक्तिसंकोच की परम अवस्था है। ऊर्ध्व कुंडलिनी शक्ति विकास की चरम अवस्था है। इस पद की प्राप्ति सूक्ष्म प्राणशक्ति की सहायता से भ्रूभेद करने के बाद हो सकती हैं। शक्ति के उत्थान के अनंतर उसकी व्याप्ति होती है। जब देश, काल तथा आकार सब प्रकार के परिच्छेद मिट जाते हैं और ईश्वरीय शक्तियों का स्वाभाविक उन्मेष हो जाता है।

अमृतबिंदु विगलित होकर सुधारस से समस्त देह को प्लावित करते हैं। इस अमृतधारा को चिदानंद का प्रवाह समझना चाहिए जो जाग्रत कुंडलिनी शक्ति तथा परमशिव के परस्पर सम्मिलित होने का फल है। इस शक्ति के जागरण से जीव का अनात्म में आत्मबोध रूप अज्ञान मिट जाता है एवं अंत में आत्मा में अनात्मरूप अज्ञान भी निवृत्त हो जाता है। उस समय जीव प्रबुद्ध होकर पूर्ण अहं अथवा परमात्मा के रूप में अपना अनुभव करने लगता है।

शक्तिकुंडलिनी, प्राणकुंडलिनी, पराकुंडलिनी, अपराकुंडलिनी आदि शक्तियों के विवरण के लिए तांत्रिक साहित्य द्रष्टव्य है।